“मायाबी जुबिन (दादा)”
✍️ बिप्लब कबीराज
तुम थे सुरों के जादूगर,
गीतों से सजाए लाखों घर,
तुम्हारी आवाज़ में था पर्वत का स्पर्श,
बादल गुनगुनाते थे, जैसे कोई हर्ष।
"या अली" में रोया दिल,
"मायाबिनी" में खो गया क़िल,
असम की धरती का तुम थे उजाला,
बांग्ला, हिन्दी—हर ज़ुबान में तुम्हारा हवाला।
गीत का मतलब तुम, जीवन का अर्थ तुम,
हर दिल में बसता है तुम्हारा स्वररंग,
तुम्हारी मुस्कान में थी सादगी प्यारी,
तुम्हारे गीतों में थी जीवन की क्यारी।
दुनिया शायद अब खामोश है,
पर हवा में अब भी तुम्हारी आवाज़ है,
"एई मोन" से "पकीज़ा" तक है निशान,
तुम नहीं—पर तुम्हारे सुर हैं महान।
जुबिन दादा, चले गए तुम दूर,
फिर भी हर दिल में है तुम्हारा नूर,
आँखों में आँसू, दिल में आग,
फिर भी कहते हैं—तुम हो सदा के सुरों के मायाबी (जाग)। 🎵💔
कविता के बारे में:
“मायाबी जुबिन दादा” — बिप्लब कबीराज की रचना, केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक युग की भावना है, समर्पित असम के महान गायक जुबिन गर्ग (दादा) को।वे सिर्फ गायक नहीं थे — वे संगीत, कविता, मानवता और प्रेम की आत्मा थे।
उनकी आवाज़ ने पहाड़ों को रुलाया, नदियों को नचाया, और दिलों को आश्रय दिया।
यह कविता बांग्ला, अंग्रेज़ी, हिन्दी और असमिया—चार भाषाओं में अनूदित हुई है, ताकि जुबिन दादा की आत्मा और संगीत विश्वभर में गूँজे।
🎶 वह केवल कलाकार नहीं — वह स्वयं संगीत का महाकाव्य हैं, चिर मायाबी जुबिन दादा। 💫

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